
कि अब 'किसलय' सफ़र ही कितना बाकी है
हुए इश्क में फ़ना कई दीवाने यहाँ 'कोमल'
चलो देखें हौसला मुझमें कितना बाकी है
चश्म-ए-तर जो हुए फिक्र उसकी नहीं
बेजान जिस्म में लहू कितना बाकी है
नफ़रतों की आँधी जो रुके तो देखेंगे हम
किस दिल में अब ख़ुदा, कितना बाकी है
हर दीवार तोड़ जब आये उसकी आगोश में
तो जाना अभी फ़ासला कितना बाकी है
ख़्वाब देखना कभी तो याद रखना इक बात
जो बिखर जाएँ, समेटना कितना बाकी है
कि अब तो पूछने लगी है सबा भी मुझसे
उसकी खुशबू लाना और कितना बाकी है
इस तारीकी में इल्म होता नहीं जिस्म को
दिल से दूर जाना अभी कितना बाकी है
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