सब्ज़ मौसम चले गए,
उनकी कुरवत के भी दिन चले गए
करते रहे जिनका इन्तेजार हर घडी
हमें कुछ बताए बिन चले गए
हर पल यूँ लगा जैसे दी हो तुमने दस्तक
मगर तुम आये नहीं, हर पलछिन चले गए
दिन भर तकते रहे राह चलते लोगों को
और रात तारे गिन - गिन चले गए
मयखाने ले आये लोग दर्द-ए-दवा बताकर
और फिर, हमें पिलाए बिन चले गए
इश्क में लुटने की वजह हम समझा न सके
और वो भी हमें समझाए बिन चले गए
सकूँ इतना कि कर दिया इजहार हमने
दीवाने कितने इश्क जताए बिन चले गए
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