
किसी का ख्याल भी इस दिल में न आने पाए
आये जो भी आये, जज्बात कोई न आने पाए
मेरी ख्वाईशें तो कुचल दीं, खुद मेरी वफ़ा ने
कम-अज़-कम इन आँखों से, वो न जाने पाए
रास्ते तक-तक, सो गयी अब ये रात भी देखो
मुझे तन्हा देख वो चाँद, मगर न जाने पाए
कुछ बातें थीं, जो उसने कही और हमने सुनी
और कुछ ऐसी भी, जो उन लबों पे न आने पाए
तन्हाई जाती नहीं, किसी के भी साथ हो जाने से
जिन्दगी ही क्या, जो संग अपनों के, न बिताने पाए
उसे छोड़ पाना जो हमसे न हो पाया कभी
रुख़सत हुए हर बार, मगर दूर न जाने पाए
बदकिस्मती को दगा देने की जुर्रत भी की बेशक़
हम मिटते गए, परदे उन नज़रों से न उठाने पाए
हालात् मेरे बिगडे थे कुछ इस क़दर यारों
अपनी बेगुनाही पे उन्हें यकीं न दिलाने पाए
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल गया जिस्म मेरा
शब्-ए-हिज्र इन आँखों से दो बूँद भी न गिराने पाए
| Comments |
|
Powered by !JoomlaComment 3.26
3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved."
| < Prev | Next > |
|---|


